एक शाम

पक्षियों के कोलाहल के बीच,
एक गौरैया की चुप्पी यूँ,
खींच रही थी मुझे,अपनी तरफ,
जो एक मुंडेर पर बैठी थी,
कई देर से किसी,
सोच में गुमसुम सी,
वह चुप तो थी,पर…
कई सारे सवालों की लहरें भी,
उसके शांत समुन्द्र से उठ रही थी,
कह रही हो मानो,
सांझ हो चली है,
और तुम किस भँवर में ठहरे हो,
लौट भी आओ,
उसका यह इंतज़ार
बेसाख़्ता तीव्र गति से,
चेहरे पर उसके किसी,
अनहोनी के भावों को भर,
चिंता की लकीरें खींच रही थी,
जिसे मैं साफ़ देख सकता था…
कई देर तक जब वह यूँ ही,
बैठी रही,और जब रात,
अपनी स्याह चादर ले चली,
तो भूल कर,साथी को अपने,
दो दिप,जो जल रहे थे,
आंधियो के थपेड़ों से बचाने,
लौट गई घोसलें की तरफ़,
और फिर से एक शाम यूँ,
जीवन पाठ पढ़ा गई..!!

लेखक:- कुमार मुकेश’अंश’

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मांग का नियम

मांग का नियम
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मैंने सोचा कि…
तेरा मेरा रिश्ता,
कीमत पूर्ति का है,
जिसमे मै बढूंगा,
तो तुम बढोगी,
मैं घटूंगा गर,
तुम घटोगी,
पर तुम पूर्ति न निकली…
ऊपर से मांग बन बैठी हो…
अब हम साथ कैसे चले…
कैसे मिले..?
मैं जाता हूँ उत्तर,
तुम दक्षिण चली जाती हो…
ऐसा करो कि तुम-
गिफिन वस्तु की मांग,
और मै उसकी कीमत बन जाता हूँ,
ताकि चल सके, हम साथ साथ..!!

लेखक:- कुमार मुकेश’अंश’

From the heart

आतंक बिखेर देती हो नूर ए नज़र से,
आख़िर ढूंढती क्या हो मुझ में…!!

“वेदना के फूल”

बहाएगी जलकण,तेरे रंज पर,
एक दिन पत्थर को यूँ, मॉम करेगी…

नारी तुझे कलम मेरी,
“वेदना के फूल” लिखेगी..!!

तीखे तीखे शूलों से,
सोच कुंठित का, प्रतिकार करेगी…

नारी तुझे कलम मेरी,
“वेदना के फूल” लिखेगी..!!

तोड़ेंगी मन की जंजीरे,
शब्दो को बल, भावों को हथियार करेगी…

नारी तुझे कम मेरी,
“वेदना के फूल” लिखेगी..!!

बहुत पी चुकी अब तुम पीड़ा,
चक्षु से गिरे हर अश्रु को, तेज़ाब करेगी…

नारी तुझे कलम मेरी,

“वेदना के फूल” लिखेगी ..!!

लेखक :- कुमार मुकेश’अंश’

माहवारी

दुखद …ओह दुखद है यह,
शर्मनाक भी…
प्राकृतिक प्रकिया माहवारी को,
नापाक बना डाला,
स्त्री के अस्तित्व पर, सवाल उठा डाला..!!

अब कहूँ तो क्या कहूँ ,
नैतिकता को उसने,
तार तार कर डाला,
वाह…क्या बढ़ रहा मेरा ‘सभ्य समाज’,
क्या प्रगतिशील है, विचारधारा…!!

लेखक:-कुमार मुकेश’अंश’

©सर्वाधिकार सुरक्षित

अभिलेख

बड़े घाव थे उस लाश पर,
जो वैश्यालय से निकली थी…
वो घाव अभिलेख थे,
जिंदगी पर जीत के..!!

जिसमे टूटी भी वो,
हारी भी वो,
मरी भी वो…
ओर ज़िल्लत जो बची,
उसी के नाम आई..!!

बदन पर बना हर अभिलेख,
प्रचण्ड वाणी में चीख़ रहा था…
किस तरह नोंचा उसे,
तोड़ा, मारा उसे…
भुला दिया कौन है वो ??

और अभिलेख,
वो अभिलेख इक सवाल पूछता है,
हर शख़्स से…
ये स्त्री, जो दाग है ‘सभ्य समाज’ पर,
तुम कितने “सभ्य” हो ??

लेखक:-कुमार मुकेश’अंश’

©सर्वाधिकार सुरक्षित

From the heart

जुगनू ने फिर इश्क की, तलब न जगाई होती..!!

रात अंधेरी में,राह उसके घर की न दिखाई होती..!!

हम रुसवा न होते, भरे बाज़ार,

इक झुठी सी ही सही ,उसने आवाज़ लगाई होती..!!

थम गया है,जो ज़र्रा ज़र्रा तेरे दिल मे सुन ‘अंश’

जो थार से तूने आस, बहारों की न लगाई होती ..!!

©कुमार मुकेश ‘अंश’